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आयुर्वेद विश्वविद्यालय में फिर छात्रों का प्रदर्शन: 1500 छात्रों की परीक्षा और परिणाम अटके, साढ़े 5 साल का कोर्स 7-8 सालों में भी पूरा नहीं - Dehradun News

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3 सितंबर 2026 को 04:29 pm बजे
आयुर्वेद विश्वविद्यालय में फिर छात्रों का प्रदर्शन:  1500 छात्रों की परीक्षा और परिणाम अटके, साढ़े 5 साल का कोर्स 7-8 सालों में भी पूरा नहीं - Dehradun News

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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आयुर्वेद विश्वविद्यालय में फिर छात्रों का प्रदर्शन:1500 छात्रों की परीक्षा और परिणाम अटके, साढ़े 5 साल का कोर्स 7-8 सालों में भी पूरा नहीं

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उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय से जुड़े निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के छात्रों का प्रदर्शन बुधवार को फिर शुरू हुआ जो गुरुवार को भी विश्वविद्यालय परिसर में जारी है और 5 छात्र 24 घंटो से ज्यादा समय से टंकी पर चढ़े हुए हैं बावजूद उसके अब तक विश्वविद्यालय क

गुरूवार को प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन का पुतला फूंका और नारेबाजी भी की जिन्हे इस बार कांग्रेस और भारतीय किसान यूनियन ने भी छात्रों के आंदोलन को समर्थन दिया है। छात्रों का कहना है कि पिछले करीब डेढ़ साल से वह परीक्षा कराने और परिणाम जारी करने की मांग कर रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से आश्वासन दिया जाता है समाधान नहीं। छात्रों का आरोप है कि समय पर परीक्षा नहीं होने से उनकी पढ़ाई, इंटर्नशिप और डिग्री पूरी करने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। वहीं यूनिवर्सिटी की तरफ से मामला कोर्ट में लंबित होने का हवाला दिया जा रहा है।

2019 से 2024 बैच तक के छात्र-छात्राओं के परीक्षाएं और परिणाम अटके छात्रों के अनुसार विश्वविद्यालय से संबद्ध करीब 11 निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के 2019 से 2024 बैच तक के विद्यार्थी इस विवाद से प्रभावित हैं। इनमें कोर, मदरहुड, ओम, एरोमा, शिवालीक, उत्तरांचल, देवभूमि, सूरजमल और मंजिला देवी समेत अन्य कॉलेजों के छात्र शामिल बताए जा रहे हैं। छात्रों का कहना है कि अलग-अलग बैच की स्थिति अलग है, लेकिन समस्या की जड़ नॉन-काउंसलिंग श्रेणी में हुए प्रवेश और उसके बाद परीक्षा, परिणाम तथा डिग्री की प्रक्रिया को लेकर है। कुछ बैच की परीक्षाएं पूरी हो चुकी हैं, लेकिन परिणाम रोक दिए गए हैं। कुछ विद्यार्थियों की आगे की परीक्षाएं ही नहीं हुई हैं। इससे एक ही विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच भी अलग-अलग स्तर पर शैक्षणिक नुकसान हो रहा है। छात्रों का कहना है कि फीस लेने के बाद उनकी पढ़ाई की प्रक्रिया पूरी कराना विश्वविद्यालय और संबंधित कॉलेजों की जिम्मेदारी है।

विवाद की शुरुआत खाली सीटों से हुई, कॉलेजों ने किया था कोर्ट का रुख छात्रों के मुताबिक विवाद की शुरुआत निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों में खाली रह गई सीटों से हुई। उनका कहना है कि नियमित काउंसलिंग के बाद कई कॉलेजों में बड़ी संख्या में सीटें खाली थीं। उदाहरण के तौर पर 100 सीट वाले किसी कॉलेज में काउंसलिंग से करीब 32 विद्यार्थियों का प्रवेश हुआ, जबकि लगभग 68 सीटें खाली रह गईं। कॉलेजों ने खाली सीटों से होने वाले आर्थिक नुकसान का हवाला देते हुए न्यायालय का रुख किया। छात्रों के अनुसार न्यायालय की कार्यवाही के बाद ऐसे विद्यार्थियों को प्रवेश देने की स्थिति बनी, जिन्होंने नीट परीक्षा में भाग लिया था। इसी प्रक्रिया के तहत कई छात्रों को नॉन-काउंसलिंग श्रेणी में प्रवेश दिया गया। छात्रों का कहना है कि प्रवेश के बाद विश्वविद्यालय ने उनके दस्तावेजों का सत्यापन किया, नामांकन किया और कई मामलों में परीक्षाएं भी कराईं।

जब नामांकन किया तो पूरी पढ़ाई की जिम्मेदारी किसकी-छात्र छात्रों का सबसे बड़ा सवाल इसी प्रक्रिया को लेकर है। उनका कहना है कि यदि नॉन-काउंसलिंग श्रेणी में प्रवेश को लेकर स्थिति विवादित थी तो विश्वविद्यालय ने प्रवेश के समय दस्तावेजों का सत्यापन क्यों किया और नामांकन कैसे किया। छात्रों का दावा है कि उनसे निर्धारित फीस भी ली गई और इसके बाद उन्हें परीक्षा में बैठाया गया। कई विद्यार्थियों ने अलग-अलग वर्षों की परीक्षाएं भी दीं। अब जब कुछ बैच की पढ़ाई अंतिम चरण में पहुंच चुकी है तो परीक्षा, परिणाम या डिग्री रोकने से छात्र असमंजस में हैं। उनका कहना है कि किसी विद्यार्थी को बीच पढ़ाई में यह नहीं बताया जा सकता कि उसकी प्रवेश प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है। छात्रों का तर्क है कि नामांकन केवल एक वर्ष की परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि पूरी पाठ्यक्रम अवधि के लिए होता है। इसलिए यदि प्रवेश और नामांकन हुआ तो पूरी डिग्री की प्रक्रिया पूरी कराने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

2019 और 2020 बैच की पढ़ाई पूरी, फिर भी डिग्री-परिणाम पर सवाल सबसे ज्यादा परेशानी उन छात्रों को है जिनकी पढ़ाई लगभग पूरी हो चुकी है। 2019 बैच के विद्यार्थियों का कहना है कि विश्वविद्यालय ने प्रथम वर्ष से अंतिम वर्ष तक उनकी परीक्षाएं कराईं और परिणाम भी जारी किए। अब डिग्री देने के समय नॉन-काउंसलिंग प्रवेश को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। छात्रों के अनुसार इसी मामले में वे हाईकोर्ट तक गए और डिग्री जारी करने के संबंध में आदेश भी प्राप्त किया। उनका आरोप है कि इसके बावजूद कुछ विद्यार्थियों को डिग्री मिल गई, जबकि कुछ की डिग्री रोक दी गई। इसी मामले में छात्रों ने न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की है। 2020 बैच की स्थिति भी विवादित बताई जा रही है। छात्रों के अनुसार इस बैच की प्रथम वर्ष से अंतिम वर्ष तक परीक्षाएं हो चुकी हैं, लेकिन कुछ विद्यार्थियों के परिणाम जारी किए गए और कुछ के परिणाम रोक दिए गए।

2021 बैच का प्रथम वर्ष परिणाम आया, आगे की परीक्षाएं रोक दी गईं 2021 बैच के छात्रों की स्थिति थोड़ी अलग है। छात्रों के अनुसार विश्वविद्यालय ने न्यायालय के आदेश के बाद उनका नामांकन किया और प्रथम वर्ष की परीक्षा भी कराई। इसका परिणाम भी जारी कर दिया गया। इसके बाद आगे की परीक्षाएं नहीं कराई गईं। छात्रों का कहना है कि अब विश्वविद्यालय की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि आगे की परीक्षा कराने के लिए न्यायालय का अलग आदेश मौजूद नहीं है। यही बात छात्रों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। उनका सवाल है कि जब एक बार न्यायालय के आदेश के आधार पर प्रवेश और नामांकन हुआ और प्रथम वर्ष की परीक्षा भी करा दी गई, तो प्रत्येक अगले वर्ष की परीक्षा के लिए अलग आदेश क्यों जरूरी है। छात्रों का कहना है कि यदि अदालत में प्रवेश को लेकर स्थिति स्पष्ट होने के बाद विश्वविद्यालय ने उन्हें विद्यार्थी के रूप में स्वीकार किया था, तो उनकी आगे की पढ़ाई भी उसी प्रक्रिया के तहत जारी रहनी चाहिए।

बाकी बैच के छात्र भी इंतजार में, फीस जमा लेकिन परीक्षा नहीं हुई विवाद केवल 2019, 2020 और 2021 बैच तक सीमित नहीं है। छात्रों के मुताबिक बाद के बैच के कई विद्यार्थी भी परीक्षा नहीं होने के कारण प्रभावित हैं। इन छात्रों का कहना है कि कॉलेजों में प्रवेश के समय उनसे फीस ली गई और उन्होंने पढ़ाई भी की, लेकिन अब परीक्षा की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है। इससे विद्यार्थियों को यह चिंता सता रही है कि उनका पूरा शैक्षणिक सत्र कब पूरा होगा। एक बैच की परीक्षा लंबित होने का असर अगले बैच की कक्षाओं और इंटर्नशिप पर भी पड़ रहा है। छात्रों का कहना है कि वे नियमित रूप से कॉलेज जाते रहे, फीस जमा करते रहे और पाठ्यक्रम पूरा करते रहे, लेकिन परीक्षा की तारीख स्पष्ट नहीं होने के कारण उनका भविष्य अधर में है। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय और कॉलेजों के बीच चल रहे विवाद का खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है।

साढ़े पांच साल की पढ़ाई सात-आठ साल में भी पूरी नहीं बीएएमएस पाठ्यक्रम की पढ़ाई और इंटर्नशिप मिलाकर सामान्य तौर पर करीब साढ़े पांच साल का समय माना जाता है। छात्रों का आरोप है कि परीक्षा और परिणाम में देरी के कारण उनकी पढ़ाई सात से आठ साल तक खिंच रही है। 2019 बैच के विद्यार्थी अब भी डिग्री की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। छात्रों के मुताबिक 2018 बैच का परिणाम भी वर्ष 2026 में जाकर जारी हुआ। वहीं 2023 बैच के अंतिम वर्ष का परिणाम लंबित बताया जा रहा है। छात्रों का कहना है कि देरी का असर सिर्फ कॉलेज की पढ़ाई तक सीमित नहीं है। डिग्री नहीं मिलने से वे आगे की पढ़ाई, इंटर्नशिप, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार से जुड़े अवसरों में भी समय पर शामिल नहीं हो पा रहे हैं। यही वजह है कि लंबे समय से चली आ रही नाराजगी अब आंदोलन में बदल गई है।

समाधान नहीं, विश्वविद्यालय दे रहे हैं कोर्ट में लंबित केस का हवाला प्रदर्शन कर रहे छात्रों की माने तो जब भी वे विश्वविद्यालय प्रशासन से परीक्षा और परिणाम को लेकर जानकारी मांगते हैं तो उन्हें न्यायालय में चल रहे मामलों का हवाला दिया जाता है। विश्वविद्यालय की ओर से न्यायालय में लंबित मामलों के कारण प्रक्रिया प्रभावित होने की बात कही जाती है। छात्रों का कहना है कि उन्हें न्यायालयी विवाद की पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं की जा रही है और न ही यह बताया जा रहा है कि किस बैच की परीक्षा किस आधार पर रोकी गई है। छात्रों का कहना है कि यदि प्रवेश, नामांकन, फीस और कई मामलों में परीक्षाएं पहले ही हो चुकी हैं तो अब पूरी प्रक्रिया को रोकने का स्पष्ट आधार क्या है। छात्र चाहते हैं कि विश्वविद्यालय प्रत्येक बैच की स्थिति अलग-अलग स्पष्ट करें और यह बताए कि किस विद्यार्थी की परीक्षा, परिणाम या डिग्री क्यों रोकी गई है।

कोई बात करे और समाधान निकाले तो खत्म होगा आंदोलन बुधवार से शुरू हुए प्रदर्शन में छात्रों को कांग्रेस और भारतीय किसान यूनियन का समर्थन मिलने के बाद आंदोलन और मुखर हो गया है। प्रदर्शनकारी छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए पुतला फूंका। छात्रों का कहना है कि वे कई बार बातचीत के जरिए समाधान की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अब तक कोई ठोस समय सीमा नहीं मिली। इसलिए इस बार वे केवल मौखिक आश्वासन लेने के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी मांग है कि सभी लंबित परीक्षाओं की तारीख तय की जाए जिन बैच के परिणाम रुके हैं उन्हें जारी किया जाए और पात्र विद्यार्थियों को डिग्री देने की प्रक्रिया पूरी की जाए। छात्रों का कहना है कि फीस लेने के बाद परीक्षा और परिणाम रोकने से उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है। जब तक विश्वविद्यालय लिखित रूप से समयबद्ध समाधान नहीं देता तब तक विश्वविद्यालय परिसर में उनका आंदोलन जारी रहेगा।

हाई कोर्ट के अंतिम निर्णय के बाद होगा समाधान इस विवाद और छात्रों के प्रदर्शन के बीच उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार शिव कुमार बरनवाल का कहना है कि छात्रों का मामला गैर-काउंसलिंग से हुए प्रवेश से जुड़ा है। यह मामला फिलहाल उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि अदालत के अंतिम फैसले के बाद ही छात्रों की परीक्षा और परिणाम जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। इसके अलावा यदि एनसीआई की ओर से इन छात्रों को नियमित करने का निर्णय लिया जाता है तो उसके बाद भी प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।

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