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India Manufacturing Skills Gap: भारत के विनिर्माण सपने के लिए कौशल विकास में बड़े बदलाव की जरूरत

भारत विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) को विकास, निर्यात और रोजगार का एक बड़ा इंजन बनाना चाहता है। वह इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, मशीनरी, वस्त्र, औषधि और स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों के क्षेत्र में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति…

24 सितंबर 2026 को 12:02 am बजे
India Manufacturing Skills Gap: भारत के विनिर्माण सपने के लिए कौशल विकास में बड़े बदलाव की जरूरत

सौजन्य से:- hindi.business-standard.com

भारत विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) को विकास, निर्यात और रोजगार का एक बड़ा इंजन बनाना चाहता है। वह इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, मशीनरी, वस्त्र, औषधि और स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों के क्षेत्र में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन, औद्योगिक गलियारे, रसद (लॉजिस्टिक्स) में निवेश और वैश्विक निर्माताओं को आकर्षित करने के प्रयास, ये सभी इसी दिशा में इशारा करते हैं। लेकिन कारखानों को केवल जमीन, बिजली और पूंजी से कहीं अधिक की आवश्यकता होती है।

उन्हें ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो मशीनें चला सकें, इंजीनियरिंग ड्रॉइंग पढ़ सकें, औद्योगिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर सकें, विद्युत प्रणालियों को स्थापित और उनका रखरखाव कर सकें, गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रियाओं को संचालित कर सकें और तेजी से स्वचालन और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स को संभाल सकें। लेकिन भारत में श्रम शक्ति तो बहुत अधिक है, पर औपचारिक रूप से प्रशिक्षित श्रमिकों की संख्या कम है।

कई कंपनियां, विशेषकर इंजीनियरिंग क्षेत्र में, अपने स्वयं के कौशल विकास कार्यक्रम चलाती हैं। लेकिन ये कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डालने के लिए बहुत छोटे हैं। वर्ष 2025 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण से पता चलता है कि 15 से 29 आयु वर्ग के केवल 4.9 फीसदी भारतीयों ने औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया था। अन्य 21.2 फीसदी ने अनौपचारिक स्रोतों से कौशल हासिल किया था। औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण केवल एक छोटे से वर्ग तक ही पहुंच पाता है। बेशक, भारत का दावा है कि उसने बहुत बड़ी संख्या में लोगों को प्रशिक्षित किया है।

इस वर्ष जून तक सरकार के प्रमुख कौशल विकास कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) के तहत 1.65 करोड़, जन शिक्षण संस्थान के तहत 36.6 लाख, राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रोत्साहन योजना के तहत 53 लाख और शिल्पकार प्रशिक्षण योजना के तहत औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) के माध्यम से 1.07 करोड़ लोगों की संचयी भागीदारी दर्ज की गई है।

इन आंकड़ों को जोड़ने पर कार्यक्रमों में भाग लेने वालों की संख्या 3.2 करोड़ से अधिक हो जाती है। लेकिन ये लोग विशिष्ट रूप से कुशल श्रमिक नहीं हैं। ये योजनाएं विभिन्न गतिविधियों, अवधियों और श्रेणियों को कवर करती हैं, और अप्रेंटिसशिप (प्रशिक्षुता) किसी स्थायी कौशल योग्यता के बराबर नहीं होती। अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्रशिक्षण के बाद क्या होता है? क्या श्रमिक उत्पादक कार्य कर सकता है? क्या नियोक्ता उसकी योग्यता को मान्यता देता है?

क्या कौशल किसी विशेष कारखाने की आवश्यकताओं के अनुरूप होगा? आइए देश के सबसे बड़े विनिर्माण उद्योगों में से एक, वाहन उद्योग पर विचार करें। राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (एनसीएईआर) द्वारा उद्योग परामर्शों पर आधारित एक हालिया अध्ययन में पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ नए व्यवसायों में भी कमी पाई गई।

क्या किया जाना चाहिए? हमेशा की तरह, चीन और अन्य एशियाई देशों से सीखना अच्छा है जिन्होंने तीव्र औद्योगीकरण के लिए आदर्श स्थापित किए हैं। तीव्र कौशल विकास के बिना यह असंभव है। वर्ष 1978 में चीन द्वारा अर्थव्यवस्था खोलने और सुधारों को अपनाने के बाद, कौशल संबंधी समस्या के प्रति देश की प्रारंभिक प्रतिक्रिया सीधी थी। उसने औद्योगीकरण वाली अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा की संरचना में परिवर्तन किया।

वर्ष1978 में माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या कुल छात्रों का मात्र 7.6 फीसदी थी। वर्ष 1985 के शिक्षा सुधार ने व्यावसायिक शिक्षा के विस्तार को एक केंद्रीय उद्देश्य बनाया, जिसका लक्ष्य बुनियादी से लेकर उन्नत स्तर तक तकनीकी शिक्षा की एक प्रणाली का निर्माण करना और इसे विभिन्न उद्योगों से जोड़ना था। वर्ष 1990 तक, व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या सामान्य माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों से अधिक हो गई थी। चीन का दृष्टिकोण औद्योगीकरण के साथ-साथ व्यावसायिक क्षमता का निर्माण करना था। चीन के शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, 2012 और 2021 के बीच, उसके व्यावसायिक संस्थानों ने 6.1 करोड़ कुशल पेशेवर तैयार किए।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उद्योगों में बदलाव के साथ-साथ पाठ्यक्रमों में भी परिवर्तन आया। 1,000 से अधिक व्यावसायिक विषयों को जोड़ा या उन्नत किया गया, जबकि 108 अप्रचलित विषयों को बंद कर दिया गया। औद्योगिक आवश्यकताओं के प्रति यह शैक्षिक प्रतिक्रिया संस्थागत रूप ले चुकी है और सुचारु रूप से जारी है।

ताइवान का अनुभव भारत की विनिर्माण संबंधी आकांक्षाओं के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि व्यावसायिक शिक्षा का विकास औद्योगीकरण के साथ-साथ हुआ। अर्थव्यवस्था के श्रम प्रधान उत्पादन से पूंजी और प्रौद्योगिकी प्रधान उद्योगों की ओर बढ़ने के साथ-साथ इसकी प्रणाली में बार-बार बदलाव किए गए। व्यावसायिक पाठ्यक्रम उद्योग की आवश्यकताओं के विश्लेषण के आधार पर तैयार किए गए थे, जबकि हाल के कार्यक्रमों ने व्यावसायिक विद्यालयों, तकनीकी विश्वविद्यालयों और कंपनियों के बीच सहयोग को मजबूत किया है। वियतनाम भी व्यावसायिक शिक्षा को उद्यमों और श्रम बाजार से अधिक निकटता से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।

इन सभी देशों ने ऐसे तंत्र विकसित किए जिनके माध्यम से उनकी औद्योगिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा और कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले प्रशिक्षण पर पड़ सके। भारत को इसी कड़ी को मजबूत करने की आवश्यकता है। भारत में सेक्टर स्किल काउंसिल, आईटीआई, अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम, पीएमकेवीवाई और उद्योग-संबंधित कार्यक्रमों का एक विस्तृत नेटवर्क मौजूद है। सरकार 1,000 आईटीआई को उन्नत बनाने और भविष्य के कौशल पाठ्यक्रम शुरू करने का भी प्रयास कर रही है। अप्रेंटिसशिप विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रशिक्षण को कार्यस्थल के भीतर ही प्रदान करती है। फिर भी, आर्थिक समीक्षा 2025-26 में यह बताया गया है कि वित्त वर्ष 2026 में केवल लगभग 6,100 उद्यम ही सक्रिय रूप से अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण में लगे हुए थे, जिनमें 9,90,000 प्रशिक्षु नामांकित थे।

किसी भी तरह का सार्थक प्रभाव डालने के लिए, इन कार्यक्रमों के लिए उद्योग-प्रशिक्षण से निरंतर प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। भारत को उन कारखानों और प्रौद्योगिकियों की पहचान करनी होगी जिन्हें वह आकर्षित करना चाहता है। उसे उन व्यवसायों का पूर्वानुमान लगाना होगा जिनकी उन्हें आवश्यकता होगी, आवश्यक योग्यताओं को परिभाषित करना होगा, पाठ्यक्रमों को फिर से तैयार करना होगा और श्रमिकों को प्रशिक्षित करना होगा। उसे उन्हें प्रशिक्षुता के माध्यम से कारखानों में लगाना होगा, रोजगार, वेतन और उत्पादकता का आकलन करना होगा और पाठ्यक्रम में पुनः परिवर्तन करना होगा। चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान और वियतनाम ने इस प्रक्रिया के विभिन्न रूप विकसित किए हैं। जब तक भारत ऐसा नहीं करता, ‘कौशल विकास’ के नाम पर अरबों रुपये बरबाद होते रहेंगे और भारत का विनिर्माण सपना सिर्फ एक सपना ही रह जाएगा।

(लेखक मनीलाइफ फाउंडेशन डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)

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