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वह सुंदर वृक्ष, जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति फिर सींच रही है

Advertisement 2 अक्टूबर आते ही महात्मा गांधी का स्मरण स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के नायक के रूप में स्मरण करने के साथ एक व्यापक जीवन दर्शन के प्रणेगा के रूप में भी देखने और समझने की आवश्यकता है. यह उस…

2 अक्टूबर 2026 को 12:02 pm बजे
वह सुंदर वृक्ष, जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति फिर सींच रही है

सौजन्य से:- aajtak.in

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2 अक्टूबर आते ही महात्मा गांधी का स्मरण स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के नायक के रूप में स्मरण करने के साथ एक व्यापक जीवन दर्शन के प्रणेगा के रूप में भी देखने और समझने की आवश्यकता है. यह उस भारत को याद करने का अवसर भी है, जिसकी कल्पना गांधी जी ने की थी, ऐसा भारत जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो, अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करता हो और आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी मौलिक पहचान को न खोए.

शिक्षा के प्रश्न पर गांधीजी का चिंतन इसी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. आज से लगभग 95 वर्ष पहले, 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के चैथम हाउस में गांधीजी ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था पर बोलते हुए एक ऐसी उपमा दी, जो आगे चलकर भारतीय शिक्षा के इतिहास में विशेष रूप से चर्चित हुई, उन्होंने कहा कि ब्रिटिश प्रशासकों ने भारत की शिक्षा-व्यवस्था को समझने और उसके अनुरूप आगे बढ़ाने के बजाय उसकी जड़ों को ही उखाड़ना शुरू कर दिया, उनके शब्दों में, उन्होंने मिट्टी को कुरेदा, जड़ों को देखा और जड़ को वहीं छोड़ दिया और “सुंदर वृक्ष” नष्ट हो गया.

यहीं से ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ का रूपक सामने आता है, यह उनकी शिक्षा संबंधी दृष्टि को व्यक्त करने वाला रूपक था. बाद में गांधीजी के इस कथन से प्रेरित होकर सुप्रसिद्ध इतिहासकार धर्मपाल ने भारतीय स्वदेशी शिक्षा पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ रखा, उन्होंने 18वीं और 19वीं सदी के विभिन्न ब्रिटिश अभिलेखों और शिक्षा संबंधी सर्वेक्षणों के आधार पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था का दस्तावेजी अध्ययन किया. गांधीजी का प्रश्न केवल यह नहीं था कि भारत में कितने विद्यालय थे, उनका मूल प्रश्न इससे कहीं बड़ा था, क्या शिक्षा समाज की अपनी आवश्यकताओं, भाषाओं, परंपराओं और जीवन-पद्धति से जुड़ी हुई थी?

आज जब हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को देखते हैं तो यह प्रश्न नए संदर्भ में फिर सामने आता है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भारत को अपनी शिक्षा-व्यवस्था को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं से जोड़ना होगा. नीति भारतीय भाषाओं, स्थानीय संदर्भों, भारतीय ज्ञान परंपरा, कला, संस्कृति, व्यावसायिक शिक्षा और समग्र विकास को शिक्षा के केंद्र में लाने की बात करती है.

प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है और जहां संभव हो, कम से कम कक्षा 5 तक अगर बेहतर हो तो कक्षा 8 और आगे तक मातृभाषा में शिक्षण का प्रावधान किया गया है. यह परिवर्तन केवल भाषा का परिवर्तन नहीं है. भाषा बदलने से सीखने का अनुभव बदलता है. जिस विद्यार्थी के घर में जिस भाषा में भावनाएं व्यक्त होती हैं, वही भाषा अगर उसके सीखने की पहली सीढ़ी बने तो शिक्षा उसके लिए अधिक स्वाभाविक और अर्थपूर्ण हो सकती है.

इसी कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहुभाषिकता को भी बढ़ावा देती है. तीन-भाषा सूत्र को अधिक लचीला बनाते हुए भारतीय भाषाओं के अध्ययन और उनके साहित्य से परिचय पर बल दिया गया है.

गांधीजी के ‘सुंदर वृक्ष’ और आज की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बीच दूसरा महत्वपूर्ण संबंध शिक्षा के स्थानीयकरण का है. औपनिवेशिक व्यवस्था ने शिक्षा को एक समान प्रशासनिक ढांचे में ढालने का प्रयास किया.

गांधीजी का जोर इसके विपरीत स्थानीय समाज और ग्रामीण आवश्यकताओं से जुड़ी शिक्षा पर था, उन्होंने गांव-गांव में विद्यालय और स्थानीय शिक्षक की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी शिक्षा को केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं रखती, इसमें व्यावसायिक शिक्षा, कला, खेल, विज्ञान, मानविकी और कौशल के बीच कठोर विभाजन समाप्त करने की बात कही गई है. विद्यार्थी को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार विषय चुनने की अधिक स्वतंत्रता देने का उद्देश्य है, शिक्षा का लक्ष्य केवल नौकरी पाने वाला व्यक्ति तैयार करना नहीं, अपितु विचारशील, सक्षम और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है.

तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण संबंध है जड़ों से जुड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ना. भारतीय शिक्षा को अपनी परंपरा से जोड़ने का अर्थ अतीत में लौट जाना नहीं है. इसका अर्थ है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को भी अध्ययन का वैध क्षेत्र माना जाए. गणित, चिकित्सा, खगोल, कृषि, दर्शन, भाषा हो या कला भारत की बौद्धिक परंपराओं को प्रमाण और आलोचनात्मक अध्ययन के साथ विद्यार्थियों तक पहुंचाना आवश्यक है.

यही कारण है कि नवीन पाठ्यचर्या में भारतीय ज्ञान परंपरा को स्थान मिल रहा है. विद्यार्थियों को यह जानने का अवसर मिल रहा है कि ज्ञान की भारतीय यात्रा केवल पुरानी कथाओं का संग्रह नहीं, बल्कि विचार, तर्क, अनुभव, प्रयोग और सामाजिक जीवन से जुड़ी एक विस्तृत परंपरा रही है. स्वतंत्रता के अमृतकाल में भारतीय शिक्षा के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती और अवसर है. हमें ऐसा शिक्षा-वृक्ष चाहिए जिसकी जड़ें भारतीय हों, तना मजबूत हो और शाखाएं पूरे विश्व तक फैली हों.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी दिशा में एक व्यापक परिवर्तन का प्रथम सार्थक प्रयास है. यह परंपरा और आधुनिकता को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संवाद स्थापित करती है. मातृभाषा के साथ वैश्विक भाषाएं, भारतीय ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान, स्थानीय अनुभव के साथ वैश्विक दृष्टि और संस्कार के साथ कौशल यही नई शिक्षा की समग्र तस्वीर है.

गांधी जयंती पर ‘सुंदर वृक्ष’ की उस उपमा को याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिक्षा की जड़ें दिखाई नहीं देतीं, लेकिन वही पूरे ज्ञान रुपी वृक्ष को जीवन देती हैं. जिस शिक्षा की जड़ें समाज, भाषा, संस्कृति और जीवन से कट जाएं, वह कितनी भी आधुनिक क्यों न दिखाई दे, भीतर से कमजोर हो सकती है. भारत को आज ऐसे ही शिक्षा-वृक्ष की आवश्यकता है, जो अपनी मिट्टी में गहरा धंसा हो, लेकिन जिसकी शाखाओं पर भविष्य की दुनिया के सपने फलते हों, शायद गांधीजी के ‘सुंदर वृक्ष’ का सबसे सार्थक पुनर्पाठ यही है. जड़ों को बचाइए, नई शाखाओं को बढ़ने दीजिए और शिक्षा को ऐसा बनाइए जो भारत को समझे भी और भविष्य को गढ़े भी.

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