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इलाहाबाद विश्वविद्यालय का 139वां स्थापना दिवस; महान विभूतियों की प्रदर्शनी के साथ 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' पर हुआ मंथन

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का 139वां स्थापना दिवस; महान विभूतियों की प्रदर्शनी के साथ 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' पर हुआ मंथन पिछले कुछ वर्षों में योग्य शिक्षकों की नियुक्तियों के बाद शोध और पठन-पाठन का स्तर काफी संवरा. By ETV B…

23 सितंबर 2026 को 12:02 pm बजे
इलाहाबाद विश्वविद्यालय का 139वां स्थापना दिवस; महान विभूतियों की प्रदर्शनी के साथ 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' पर हुआ मंथन

सौजन्य से:- ETV Bharat

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का 139वां स्थापना दिवस; महान विभूतियों की प्रदर्शनी के साथ 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' पर हुआ मंथन

पिछले कुछ वर्षों में योग्य शिक्षकों की नियुक्तियों के बाद शोध और पठन-पाठन का स्तर काफी संवरा.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : September 23, 2026 at 5:06 PM IST

प्रयागराज: पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले ऐतिहासिक इलाहाबाद विश्वविद्यालय का बुधवार को 139वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है. डेढ़ सदी के करीब पहुंचे इस संस्थान की पहचान केवल इसके भव्य भवनों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस वैचारिक ऊर्जा में है जिसने देश के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर नीति-निर्माण, साहित्य, न्यायपालिका और प्रशासनिक ढांचे को गढ़ा है.

स्थापना दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय की गलियारों में एक ओर जहां समृद्ध विरासत की प्रदर्शनी सजी, वहीं दूसरी ओर वर्तमान दौर की चुनौतियों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के आधुनिक आयामों पर भी विमर्श किया गया. विश्वविद्यालय परिसर में लगाई गई एलुमनाई की गैलरी इस बात का साक्षात प्रमाण है कि ये संस्थान सिर्फ डिग्री बांटने का केंद्र नहीं, बल्कि प्रतिभाओं की शाला रहा है.

बात करें प्रदर्शनी की तो यूनिवर्सिटी में राजनेताओं में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा, कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और पंडित गोविंद बल्लभ पंत. साहित्य में महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, हरिवंश राय बच्चन, फिराक गोरखपुरी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अमरकांत, कमलेश्वर और विद्यानिवास मिश्र.

न्यायविद और प्रशासक में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अशोक भूषण, विनीत सरन, पंकज मित्तल, वरिष्ठ नौकरशाह बी.के. चतुर्वेदी, त्रिलोकीनाथ जैन और निखिल कुमार और कला और संस्कृति के क्षेत्र में तिग्मांशु धूलिया, सईद जाफ़री, विनय पाठक और प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट सुधीर धर केद्र बनें.विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक दौर को याद करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार यश मालवीय ने बताया कि उस समय के छात्रावास किसी गुरुकुल से कम नहीं थे.

उन्होंने कहा, "इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संस्कृति का सूरज उगता था और छात्रावासों के कमरों तक उसकी किरणें पहुंचती थीं. ताराचंद जैसे छात्रावासों में कन्हैयालाल नंदन, बच्चन, कमलेश्वर जैसे दिग्गज रहें. कभी निराला जी आ जाते थे, कभी फिराक साहब बैठ जाते थे. वह दौर केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश को प्राणवायु देता था.

भूगोल विभाग के शोधार्थी अभिनव का मानना है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय सिर्फ एक सेल्फी पॉइंट नहीं. "पिछले कुछ वर्षों में योग्य शिक्षकों की नियुक्तियों के बाद शोध और पठन-पाठन का स्तर काफी संवरा है. आज देश के अलग-अलग राज्यों से छात्र यहां पढ़ने के लिए आ रहे हैं. संस्थान 139 वर्षों के अपने सफर को आगे भी उतनी ही मजबूती से जारी रखे हुए है.

वहीं, विश्वविद्यालय की जनसंपर्क अधिकारी प्रोफेसर जया कपूर ने संस्थान की वर्तमान प्राथमिकताओं और भविष्य के रोडमैप को साझा किया. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय 140वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है और ये विरासत केवल संजोने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता का संकल्प है.

उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत 200 से अधिक इलेक्टिव और इंटरडिसिप्लिनरी कोर्सेज शुरू किए गए हैं, ताकि छात्रों का समग्र व्यक्तित्व विकास हो और वे वैश्विक जरूरतों के अनुरूप तैयार हों. कटिंग-एज विषयों पर शोध को बढ़ावा दिया जा रहा है.

वहीं सिविल सेवा (IAS/PCS) में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का पुराना दबदबा फिर से लौटने लगा है और इस दिशा में विशेष अकादमिक माहौल तैयार किया जा रहा है. पूरब का ये ऐतिहासिक संस्थान अपनी शानदार बौद्धिक धरोहर को आधार बनाकर नए युग के तकनीकी और अकादमिक बदलावों के साथ कदमताल करने को तत्पर दिखाई दे रहा है.

ये भी पढ़ें- इलाहाबाद विश्वविद्यालय में विश्वेश्वरैया योजना से पीएचडी का मौका, आवेदन शुरू, जानिए कितनी मिलेगी मंथली फेलोशिप

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